हैदराबाद, 21,जनवरी 2026, Rewadarshannews18
हैदराबाद यूनिवर्सिटी में नीरजा माधव को ‘माफी मांगो’ का हंगामा
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला

हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रख्यात लेखिका डॉ. नीरजा माधव को हिंसक नारेबाजी और घेराबंदी का सामना करना पड़ा। थर्ड जेंडर विमर्श पर व्याख्यान के दौरान उनके बयानों पर आपत्ति जताते हुए एआईएसए और एसएफआई से जुड़े सैकड़ों छात्रों ने उनकी कार घेर ली और माफी की मांग करने लगे। लेखिका ने साहसपूर्वक इसका विरोध किया, जिससे घटना ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विश्वविद्यालय परिसरों में वैचारिक असहिष्णुता का सवाल खड़ा कर दिया।
विगत 20 जनवरी को हिंदी विभाग द्वारा आयोजित सेमिनार में डॉ. नीरजा माधव को मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था। वे सनातन संस्कृति और हिंदी साहित्य की प्रखर चिंतक के रूप में जानी जाती हैं। मूल रूप से ‘थर्ड जेंडर विमर्श’ पर व्याख्यान का न्योता था, लेकिन आयोजकों ने उनके सामने अनुरोध रखा कि वे भारतीय संस्कृति के संदर्भ में भी अपनी राय साझा करें। इस पर सहमत होकर नीरजा माधव ने ‘भारतीय संस्कृति और थर्ड जेंडर’ विषय पर अपना संबोधन दिया।

व्याख्यान के प्रश्नोत्तर सत्र में माहौल तब गरमा गया, जब कुछ छात्रों ने समलैंगिकता (होमोसेक्सुअलिटी) और लेस्बियन संबंधों पर सवाल दागे। उन्होंने दावा किया कि मनुस्मृति में समलैंगिकता का संदर्भ मौजूद है, जिसके आधार पर इसे कानूनी मान्यता मिल चुकी है। इसका जवाब देते हुए नीरजा माधव ने स्पष्ट कहा, “लेस्बियन या होमोसेक्सुअलिटी किसी की मानसिक आवश्यकता या व्यक्तिगत इच्छा हो सकती है, लेकिन यह थर्ड जेंडर की समस्या से अलग है। थर्ड जेंडर प्रकृति के क्रूर मजाक का शिकार होकर अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर होते हैं।”
उन्होंने सभागार में मौजूद छात्रों से सीधा सवाल किया, “आपमें से कितनों ने ओरिजिनल मनुस्मृति पढ़ी है? कृपया हाथ उठाएं।” आश्चर्यजनक रूप से कोई हाथ नहीं उठा। नीरजा माधव ने जोर देकर कहा, “किसी ग्रंथ, शास्त्र या पुस्तक का खंडन करने से पहले उसका गहन अध्ययन अनिवार्य है। बिना पढ़े आलोचना मात्र पूर्वाग्रह को दर्शाती है।”
सत्र समाप्त होने के महज एक घंटे के भीतर ही परिसर में तनाव भड़क उठा। एआईएसए (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) और एसएफआई (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) से जुड़े सैकड़ों छात्र बैनर लिए सभागार की ओर बढ़े। नारे लगाते हुए उन्होंने नीरजा माधव की कार को घेर लिया और माफी मांगने की जिद ठोंकी। लेखिका ने हिम्मत दिखाते हुए कार से उतरकर सामना किया। उन्होंने कहा, “मैंने कोई गलत बात नहीं कही। जो कहा, वह सत्य है। आपकी असहमति हो सकती है, लेकिन माफी मांगना असंभव है।”
इसके जवाब में छात्र उग्र हो गए। मोदी विरोधी, संघ विरोधी नारे गूंजने लगे। नीरजा माधव ने इसे व्यंग्यात्मक अंदाज में टिप्पणी की, “कम्युनिस्ट विचारधारा की यह पुरानी आदत है कि तर्क खत्म होने पर फर्जी नारों का सहारा ले लिया जाता है। इस प्रकरण का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से क्या लेना-देना?”
यह घटना हैदराबाद विश्वविद्यालय की लंबी परंपरा का हिस्सा प्रतीत होती है। यहां वामपंथी संगठनों द्वारा भारतीय संस्कृति के समर्थक वक्ताओं को बोलने से रोकने के कई उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं। नीरजा माधव ने इस बार डटकर मुकाबला किया। इतना ही नहीं, प्रश्नोत्तर में एक छात्रा द्वारा अंग्रेजी में सवाल पूछे जाने पर उन्होंने टोका, “आप हिंदी विभाग की छात्रा हैं, तो हिंदी में ही प्रश्न कीजिए।” छात्रा ने इसका प्रतिरोध किया, लेकिन लेखिका अडिग रहीं।
घटना की जोरदार निंदा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और लेखक प्रो. संजय द्विवेदी ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया। उन्होंने कहा, “यह घोर असहिष्णुता का प्रतीक है कि एक लेखिका को बोलने का मौका भी न दिया जाए। भारतीय विश्वविद्यालयों में ऐसी मानसिकता को पनपने देना राष्ट्र को कमजोर करने जैसा है। संविधान की बात करना आसान है, लेकिन उसका पालन कठिन। वामपंथी विचारक सच स्वीकार नहीं कर पाते, इसलिए हिंसा पर उतर आते हैं।”
नीरजा माधव की इस साहसिकता ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। समर्थक उन्हें सनातन संस्कृति की सशक्त आवाज बता रहे हैं, जबकि आलोचक उनके बयानों को संकीर्ण मान रहे हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन छात्र संगठनों ने प्रदर्शन जारी रखने की चेतावनी दी है। यह प्रकरण व्यापक सवाल खड़ा करता है कि क्या विश्वविद्यालय परिसर बहुलतावादी संवाद के केंद्र हैं या वैचारिक एकाधिकार के गढ़? नीरजा माधव जैसी आवाजों को दबाने से हिंदी और भारतीय संस्कृति का विमर्श कैसे मजबूत होगा?





