नई दिल्ली, 21, जनवरी 2026, Rewadarshannews18

सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुआ कहा है कि शिकायतकर्ता को अब जाति के आधार पर अपमानित करने की स्पष्ट मंशा होना जरूरी है, सर्वोच्च न्यायालय ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए संबंधित मामले में एफआईआर और आरोप पत्र में जाति-आधारित अपमान के अभाव को रेखांकित किया है। कोर्ट ने एससी एसटी एक्ट की धारा 3(1) के प्रावधानों को दोहराते हुए कहा कि केवल अपशब्दों का प्रयोग अपराध नहीं माना जायेगा ना, ही अपराध बनता है।
अनुसूचित जाति या जनजाति के किसी भी व्यक्ति को सिर्फ अपशब्द कह देना एससी एसटी एक्ट के तहत तब तक अपराध नहीं माना जाएगा जब तक जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर उसे जाति के आधार पर नीचा दिखाने या अपदस्थ करने की उसकी दुर्भावना और मंशा स्पष्ट न कर दी जाए, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने इस निर्णय के जरिए स्पष्ट कर दिया गया है कि अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंध रखने वाले लोगों को केवल अपमानजनक शब्द बोल देने या फिर गाली-गलौज करने से स्वत: ही अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं बन सकता l

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने अपने निर्णय के जरिए अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का आदेश दिया है, और अपने निर्णय में पीठ ने यह भी कहा है कि न तो एफआईआर और न ही आरोप पत्र में कहीं यह आरोप है कि अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता को उसकी जाति के कारण अपमानित किया या धमकाया है l
पीठ ने साफ तौर पर कहा है कि सिर्फ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति [अत्याचार निवारण] अधिनियम,1989 के तहत अपराध नहीं बनता है, जब तक कि किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के इरादे से अपशब्द न बोले गए हों, सर्वोच्च अदालत ने अपीलकर्ता केशव महतो के पटना हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई की है l
बेंच ने अपने निर्णय में कहा है कि मौजूदा मामले में ‘ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्यवाही को जारी रखने में चूक की है, क्योंकि दर्ज एफआईआर और आरोपपत्र में कहीं भी जाति-आधारित अपमान या धमकी के किसी भी कृत्य का आरोप लगाया गया था,
सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति [अत्याचार निवारण] अधिनियम, 1989 की धारा 3 (1) के संबंधित प्रावधानों को दोहराया जो अपराधों और अत्याचारों के लिए सजा तय करते हैं, इस कानून के तहत जो कोई भी, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य न होते हुए जानबूझकर किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को सार्वजनिक स्थान पर अपमानित करने के इरादे से अपमानित करता है या डराता है, अथवा किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को सार्वजनिक स्थान पर जाति के नाम पर गाली देता है, तो वह दंडनीय अपराध है,
अपीलकर्ता केशव महतो ने सुप्रीम कोर्ट में पटना हाईकोर्ट के 15 फरवरी 2025 के फैसले को चुनौती दी थी, इसी में ट्रायल कोर्ट के समन आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया गया था, हाईकोर्ट ने महतो की अपील खारिज कर दी थी, और उसमें आंगनवाड़ी केंद्र में जाति-आधारित गाली-गलौज और मारपीट के आरोप में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर शुरू की गई कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी,
सुप्रीम कोर्ट पूर्व के फैसले का हवाला देते हुए एससीएसटी एक्ट की धारा 3 (1) (R) के प्रावधानों का जिक्र करते हुए कहा कि इसके तहत किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए, दो शर्तें पूरी होनी चाहिए, पहली यह तथ्य होना चाहिए कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का था, और दूसरा, शिकायतकर्ता के प्रति कोई भी अपमान या धमकी उस व्यक्ति के अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य होने के आधारभूत कारण होने चाहिए l





