पुरूषोत्तम मास में कथा व्यास अमरनाथ मिश्र के मुखारबिंद से बह रही है अमृत रसधार

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मां अमसोंन प्रांगण में बड़ी संख्या मे भक्त पहुंच कर भागवत कथा रूपी गंगा में लगा रहे गोता

तीसरे दिन कपिल चरित्र, सती चरित्र, ध्रुव, व जड़ भरत, नृसिंह जी की कथा हुई संपन्न

रीवा दर्शन/ 20 मई 2026, Rewadarshannews18 संपादक, उपेन्द्र द्विवेदी

ग्राम बरसैता स्थित मां अमसोंन प्रांगण में पुरुषोत्तम मास के प्रथम दिवस से आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन भक्तों को दिव्य कथा का पान कराते हुए कथा व्यास आचार्य श्री अमरनाथ महाराज ने बताया कि किसी भी स्थान पर बिना निमंत्रण बिल्कुल भी नहीं जाना चाहिए, अगर आप ऐसा करते हैं तो यह बात जरूर जान लीजिए और ध्यान भी अवश्य रख लीजिए कि जहां आप जा रहे है वहां आपका, और आपके अपने इष्ट अथवा गुरु का अपमान न हो रहा हो, अन्यथा इसके भयंकर दुष्परिणाम सामाने सकते हैं।

कथा वाचक आचार्य श्री अमरनाथ मिश्रा जी ने बताया कि जंहा अपने गुरू, इष्ट और प्रिय लोगों के अपमान की संभावना हो उस स्थान पर तो कतई नहीं जाना चाहिए। चाहे वह स्थान अपने जन्म दाता पिता का ही घर क्यों न हो। आज के इस प्रसंग में व्यास पीठ पर विराजमान महराज जी ने कथा के तीसरे दिन सती चरित्र के प्रसंग को सुनाते हुए कहा कि भगवान शिव की बात नहीं मानने और सती जी को अपने पिता के घर जाने पर घोर अपमान सहन करना पड़ा, यही नहीं इसी कारण से उन्हें स्वयं को अग्नि में स्वाहा होना पड़ा जिसकी बजह से भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हुए, और तत्काल उनके क्षीकने से भयानक रूप धारण कर वीरभद्र प्रकट हो गए और उनके द्वारा दक्ष प्रजापति का सिर धड़ से अलग कर उसी हवन कुंड में स्वाहा कर दिया गया। इसके बदले में उनका पुनर्जन्म एक बकरे के सिर के साथ हुआ और यज्ञ पूरी तरह से विध्वंस हो गया।

वहीं महराज श्री ने भागवत कथा में उत्तानपाद के वंश में जन्मे ध्रुव चरित्र की कथा को सुनाते हुए बताया गया कि ध्रुव जी की सौतेली मां सुरुचि के द्वारा अपमानित होने पर भी उसकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया जिससे बहुत बड़ा गृह क्लेश टल गया। इससे य़ह शिक्षा मिलती है कि परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य संयम की नितांत आवश्यकता होती है। भक्त ध्रुव द्वारा की गई तपस्या और श्रीहरि को प्रसन्न करने की कथा सुनाते हुए महराज जी ने बताया कि भक्ति करने के लिए कोई उम्र की बाधा नहीं है। भक्ति को बचपन में ही करने की प्रेरणा दी जानी चाहिए, क्योंकि बचपन कच्ची मिट्टी की तरह होता जिसे जैसा चाहे, वैसा पात्र बनाया जा सकता है।

इधर बलराम जी महाराज ने कहा कि जो व्यक्ति अपने जीवन में जिस प्रकार के कर्म करता है उसे उसी के अनुरूप जन्म और मृत्यु प्राप्त होती है। भगवान ध्रुव के सत्कर्मों की कथा कहते हुए बताया गया कि ध्रुव की साधना, उनके सत्कर्म तथा ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा का परिणाम स्वरूप है जिसकी बजह से उन्हें वैकुंठ लोक प्राप्त हुआ। कथा के दौरान महराज जी ने बताया कि संसार में जब-जब पाप बढ़ता है, भगवान इस धरती पर किसी न किसी रूप में अवतरित होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस कलयुग में भी मनुष्य सतयुग में भगवान श्री कृष्ण के सिखाए मार्ग का अनुसरण करे तो उसका जीवन सफल हो सकता है। कथा के दौरान उन्होंने बताया कि पाप के बाद कोई व्यक्ति नरकगामी न हो, इसके लिए श्रीमद् भागवत कथा में श्रेष्ठ उपाय और प्रायश्चित बताये गये है।

अमरनाथ महाराज ने बताया कि भागवत कथा का आयोजन उनके गुरुदेव भगवान आचारी जी महराज के विशेष आशीर्वाद और कृपा से संपन्न हो रही है, साथ ही उन्होंने कहा कि कथा में क्षेत्र वासियों एवं ग्राम वासियों का विशेष सहयोग एवं योगदान है, इसी के फल स्वरूप सामूहिक रूप से कथा संपन्न होने मे सफ़लता मिल रही है, श्रीमद् भागवत महापुराण के तीसरे दिन कथा सुनने के लिए क्षेत्रीय जनों के साथ पूरा गांव उमड़ पड़ा। श्रीमद भागवत पुराण सुनने को लेकर जनता में अभूतपूर्व उत्साह देखने को मिल रहा है।

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